गांधी जी और पत्रकारिता
डा. सुरेन्द्र वर्मा
गांधी जी का व्यक्तित्व एक बहुआयामी
व्यक्तित्व था | जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसपर
गांधी जी ने विचार न किया हो और अपनी छाप न छोडी हो | अध्यात्म
हो या धर्म, राजनीति हो या समाज, परमार्थ हो या व्यवहार –हर क्षेत्र में
उन्होंने कुछ न कुछ अपना मौलिक योगदान दिया है | वे
सत्य, अहिंसा आदि, सनातन ‘मूल्यों’ के पक्षपाती थे और व्यवहार में सत्याग्रह
जैसी ‘प्रविधि’ के प्रणेता थे |
वे चाहते थे कि ये मूल्य और प्रविधि अधिकाधिक लोग समझें और अपनाएं और
अपनी रूढिगत निद्रा से जागकर एक संतुलित और नैतिक जीवनयापन करें | गांधी जी ने इस उद्देश्य की सार्विक स्वीकृति को अपने जीवन का मिशन बना
लिया था |
गांधी जी ने पत्रकारिता को कभी एक व्यवसाय के रूप में स्वीकार नहीं किया |
वे एक मिशनरी पत्रकार थे, और वे इस बात को
अच्छी तरह समझते थे कि उनके मिशन की सफलता के लिए पत्रकारिता एक अत्यंत सशक्त
माध्यम है | हम प्राय: गांधी जी को एक पत्रकार के रूप
में नहीं देखते | वे कितने ही सफल पत्रकार क्यों न रहे हों
लेकिन उनका बहुआयामी व्यक्तित्व मूलत: एक पत्रकार-व्यक्तित्व नहीं था | मूलत: तो उनका सरोकार आध्यात्मिक मूल्यों की व्यावहारिक जगत में स्थापना
ही था | उन्होंने अपना सारा जीवन इसी उदेश्य को समर्पित
किया | उन्होंने पाया कि राजनीति में, समाज में, व्यक्ति के सोच में ही अनैतिक वृत्तियों
ने कब्ज़ा जमा रखा है और जबतक इनके विरुद्ध दृढ़ता से, आग्रह
पूर्वक, खडा न हुआ जाए, हम
सत्य को प्राप्त नहीं कर सकते | गांधी जी की
सत्याग्रह की खोज इसी का परिणाम है | और मोटे तौर पर इसी
खोज की प्रोन्नति के लिए उन्होंने अन्य साधनों के अतिरिक्त पत्रिकारिता को भी एक
साधन बनाया | लेकिन यह तो बहुत बाद की बात है | शरू से ही आरम्भ करते हैं |
ऐसा माना जा सकता है कि गांधी जी ने अपना पत्रिकारिता का सफ़र इंग्लेंड से
आरम्भ किया, और अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत
पत्रकारिता से ही की | गांधी जी जब वकालत की पढाई के लिए
इंग्लेंड जाने लगे तो उनकी माता विचलित हो उठीं | किसी
ने उनसे कहा था नवयुवक विलायत जाकर बिगड़ जाती हैं कोई कहता, मांस
खाते हैं | कोई कहता वहां शराब के बिना काम नहीं चलता
| लेकिन गांधी जी ने उनसे कहा तुम मुझपर विश्वास करो,
मैं विश्वास-घात नहीं करूंगा | इस प्रकरण में एक
जैन साधु, बेचर जी स्वामी ने, जो
गांधी परिवार के सलाहकार भी थे, खासी मदद की |
उन्होंने गांधी जी से माता के समक्ष तीन प्रतिज्ञाएं करवाईं | उनमें से एक यह भी थी की वे वहां पूर्णत: शाकाहारी और अन्नाहारी रहेंगे
तथा मांसाहार से सदैव परहेज़ करेंगे | (अन्य दो थीं कि वे
शराब और स्त्री से भी दूर रहेंगे) गांधी जी को मांसाहार से सदैव ही परहेज़ रहा
लेकिन क्योंकि मांसाहार न लेने की उन्होंने माता के समक्ष प्रतिज्ञा ली थी और
ज़ाहिर है माँ के प्रेम की खातिर वे इस बात को कभी टाल ही नहीं सकते थे, अत: इंग्लेंड में मांसाहार का विरोध और शाकाहार का समर्थन उनके लिए एक
मिशन बन गया | वे वहां शाकाहारी आन्दोलन से सक्रिय रूप
से जुड़ गए | मांसाहार के खिलाफ गांधीजी ने ब्रिटेन के
प्रतिष्ठित अखबार “वेजीटेरियन” में
लेख लिखना आरम्भ कर दिया | इसके अतिरिक्त इंग्लेंड में उन्होंने “टेलीग्राफ’
और “डेली-न्यूज़” जैसे
अखबारों के लिए भी लिखना आरम्भ कर दिया | ब्रिटेन में
पत्र-पत्रिकाओं में लिखने का यह अभ्यास गांधी जी की पत्रकारिता के आरम्भिक
प्रशिक्षण का एक हिस्सा माना जा सकता है |
दक्षिण अफ्रिका में आकर गांधी जी की पत्रकारिता अपने पूरे वर्चस्व के साथ
फली-फूली | उन्होंने वहां राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत
करने और ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध जनमत निर्माण करने के माध्यम के रूप
में पत्रकारिता का इस्तेमाल किया |
वे अपने अनुभवों को और दक्षिण अफ्रिका में सत्याग्रह के अपने प्रयोगों को अधिक से अधिक लोगों की जानकारी में
लाना चाहते थे | इसके लिए उन्होंने “इंडियन
ओपीनियन” नामक पत्र का सम्पादन करना आरम्भ किया | १९०३ में ‘इंडियन ओपीनियन’ का
पहला ही अंक चार भाषाओं में प्रकाशित हुआ | ये
भाषाएँ थीं – हिन्दी, अंग्रेज़ी,
गुजराती और तमिल; (गांधी जी भारत के संभवत:
अकेले ऐसे पत्रकार हुए चार भाषाओं में पत्रकारिता की |)पहले
ही अंक में उन्होंने पत्रकारिता के उद्देश्यों की स्पष्ट व्याख्या करते हुए बताया कि पत्रकारिता का पहला काम जनभावनाओं
को समझना और उन्हें अभिव्यक्ति देना है | इतना ही नहीं इसका
उद्देश्य वांछित भावनाओं को जाग्रत कर निर्भीकता के साथ समाज में व्याप्त बुराइयों
को उजागर करना भी है | अखबार का काम केवल सूचना भर देना नहीं है
बल्कि जन शिक्षण और जनमत निर्माण के लिए
भी अखबार ज़रूरी हैं | उन्होंने ‘इंडियन
ओपीनियन’ के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों
की समस्याओं को शिद्दत से उठाया | उनको, ‘इंडियन ओपीनियन’ के माध्यम से,
अपने अधिकारों के प्रति सजग किया | स्वतन्त्र
जीवन का महत्त्व समझाया तथा उनमें सामाजिक और राजनैतिक चेतना जाग्रत की | नस्ल भेद के खिलाफ आवाज़ बुलंद की |
भारत में आकर गांधी जी ने “नवजीवन” और “यंग इंडिया”, दो
समाचार पत्र १९१९ में निकाले | इनका प्रकाशन १९३२
में गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद बंद हो गया | जेल
से छूटने के बाद “हरिजन” निकाला जो उनके
जीवन-पर्यंत चलता रहा | उन्होंने अहिंसक उपायों से सत्य की विजय के लिए जन प्रशिक्षण हेतु अखबार
को एक महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन माना | सत्याग्रह आन्दोलन
को धार देने के लिए तथा आत्मबल विकसित करने और नैतिक भावनाओं को अपने व्यवहार में
प्राथमिक तौर पर प्रश्रय देने के लिए भी उन्होंने पत्रकारिता को माध्यम बनाया |
गांधी जी ने एक बार राजनीति के सन्दर्भ में जो कहा था, उसका आशय था कि राजनीति जो नैतिक मूल्यों से रहित है एक ऐसा जाल है
जिसमें आदमी की आत्मा फंसकर छटपटाने लगती है | यही
बात पत्रकारिता के सन्दर्भ में उनका जो मत है उसपर भी बहुत कुछ सही बैठती है |
उन्होंने हमेशा पत्रकारिता को एक मिशन की तरह अपनाया और उसे कभी व्यवसा
के रूप में ग्रहण नहीं किया | ज़ाहिर है, पत्रकारिता में उनका मिशन था – नैतिक मूल्यों की
स्थापना, सत्य अहिंसा और सत्याग्रह पर अडिग रहकर
साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष करना और इस प्रकार भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता के
सही मार्ग की ओर अग्रसर करना | गांधी जी के ये
दिशा निर्देश भारत में पत्रकारिता की लिए बिलकुल नए और क्रांतिकारी थे | गांधी जी जबतक जीवित रहे भारत में इस प्रकार की पत्रकारिता की छाप अन्य
पत्र पत्रिकाओं में भी स्पष्ट देखी जा सकती है | उन
दिनों भारत की पूरी पत्रकारिता गांधी जी के प्रभाव में आचुकी थी | यह शायद भारत में पत्रकारिता की स्वर्गिम-युग था |
बेशक, आज की पत्रकारिता इस बात से भली भाँति
अवगत है कि वह अपने आप में एक बड़ा ही प्रभावी माध्यम है और जनमत निर्माण करने में
उसका बहुत बड़ा हाथ है | लेकिन आज पत्रकारिता एक मिशन की बजाय
व्यवसाय अधिक हो गई है, और उसका नैतिक मूल्यों से पूरी तरह से
विलगाव हो गया है; इस
माध्यम का दुरुपयोग धड़ल्ले से होने लगा है | यह
पूरी तरह से विज्ञापनों पर आश्रित हो गई है | बाज़ार
के हाथों बिक गई है | आप पैसा देकर जिस तरफ भी चाहें उसे मोड़
सकते हैं | पत्रकारिता आज शायद अपने सबसे खराब वक्त
से गुज़र रही है | यह बड़े बड़े और भ्रष्ट पूंजीपतियों के हाथ
में एक खिलौना बनकर रह गई है | जन जीवन से उसका
सम्बन्ध पूर्णत: कट गया है | अत: आज पत्रकारिता
के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यही है क्या पत्रकारिता कभी पुन: नैतिक मूल्यों के हक़
में खड़ी हो सकेगी ?
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