गांधी जी की अवधारणाएं - काव्यात्मक प्रस्तुति
डॉ. सुरेंद्र वर्मा
(1)
ताबीज़
--------------
जो ग़रीब और कमज़ोर है
दुर्बल और दरिद्र है
पेट जिसका भूखा
और आत्मा अतृप्त है
जो अवश है
भाग्य भरोसे अपने जीवन
यापन
और गुज़र-बसर के लिए
अभिशप्त है
ऐसा कोई व्यक्ति
कभी न कभी
देखा तो ज़रूर होगा आपने !
कभी हावी हो जाए आपका
अहंकार
या कभी
करूं न करूं के पसोपेश में
शंका-ग्रस्त
हो जाएँ आप
तो याद कीजिए उस व्यक्ति
को
जो समृद्धि की सीढी के
सबसे नीचे पायदान पर है |
सच मानिए,
वही
आपका पड़ोसी है, वही मित्र है
याद
कीजिए उसे
और
पूछिए अपने आप से
जो
अगला कदम उठाने जा रहे हैं आप
क्या
राहत दे सकेगा
उस
अंतिम व्यक्ति को
आपके
पड़ोसी, आपके मित्र को ?
प्रश्न
का सकारात्मक उत्तर ही
आपको
सही रास्ता बतलाएगा
अंतिम
जन के कल्याण का !
यही
जंतर है
यही
ताबीज है ||
(२)
अंत:करण
की आवाज़
जैसा
कहती है, वैसा ही करते चलो |
विज्ञान के पास
एक सामान्य और अनिवार्य पद्धति है अनुसरण करने के लिए उसका
वैज्ञानिक प्रतिबद्ध हैं|
आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रयोगों के लिए भी
इसी तरह
कुछ अनिवार्य व्रत हैं, प्रतिबन्ध हैं - उन्हीं का अनुसरण करो
सत्य और अहिंसा आदि का पालन किए बिना
दावा अंतरात्मा की आवाज़ का महज़ होता है छलावा उससे बचो
पर व्रतों से प्राप्त जो अंतर्ध्वनि है उसे दबाओ मत जैसा कहती है वैसा ही करते चलो
(३)
इतिहास
विज्ञान के पास
एक सामान्य और अनिवार्य पद्धति है अनुसरण करने के लिए उसका
वैज्ञानिक प्रतिबद्ध हैं|
आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रयोगों के लिए भी
इसी तरह
कुछ अनिवार्य व्रत हैं, प्रतिबन्ध हैं - उन्हीं का अनुसरण करो
सत्य और अहिंसा आदि का पालन किए बिना
दावा अंतरात्मा की आवाज़ का महज़ होता है छलावा उससे बचो
पर व्रतों से प्राप्त जो अंतर्ध्वनि है उसे दबाओ मत जैसा कहती है वैसा ही करते चलो
(३)
इतिहास
कौन
से इतिहास की बात करते हैं आप?
एक इतिहास है
जो राजा-महाराजाओं के कार्यों का
दस्तावेज़ होता है
युद्ध, और ऐसी ही हिंसक घटनाओं से
लबरेज़ होता है
एक इतिहास है
जो राजा-महाराजाओं के कार्यों का
दस्तावेज़ होता है
युद्ध, और ऐसी ही हिंसक घटनाओं से
लबरेज़ होता है
तवारीख
इन्हीं का लेखा जोखा है
लेकिन यह वास्तविक इतिहास नहीं
इतिहास में अपवादों का लेखा जोखा है
यह हमें सत्य और अहिंसा की
राह नहीं बताता
व्यक्ति और समाज के
आत्मबल का साथ नहीं निभाता.
यह तो हमारे आत्मिक विकास
के बाधक तत्वों का वर्णन मात्र है अपवाद जो कभी कभी
सरल और सामान्य जीवन में घटित हो जाते हैं
उन्हीं का वृत्तांत है
लेकिन यह वास्तविक इतिहास नहीं
इतिहास में अपवादों का लेखा जोखा है
यह हमें सत्य और अहिंसा की
राह नहीं बताता
व्यक्ति और समाज के
आत्मबल का साथ नहीं निभाता.
यह तो हमारे आत्मिक विकास
के बाधक तत्वों का वर्णन मात्र है अपवाद जो कभी कभी
सरल और सामान्य जीवन में घटित हो जाते हैं
उन्हीं का वृत्तांत है
सत्य
इस इतिहास से परे है
अहिंसा, जो सत्य की एकमात्र अभिव्यक्ति है उसे समझने के लिए
ऐसे इतिहास को लांघना होगा
आम आदमी के प्रतिदिन के सामान्य व्यवहार में, आचरण में,
पशुता का क्रमिक त्याग ही है
वास्तविक इतिहास की कहानी है ...
और आत्मबल का विकास, सच्चा इतिहास है.
बाकायदा इसका लेखा-जोखा
हमें नहीं मिलता
लेकिन जैसा की हम जानते हैं
आदमी
अपने आदिकाल में नरभक्षी था.
बाद में शिकार से, अन्य पशुओं के मांस से
अपना पेट भरने लगा, लेकिन भला कबतक अपना जीवन इस भाग-दौड़ में बिताता? सो खेती-बाडी शुरू कर दी उसने घर बसाया परिवार बसे समाज बना – सच्चा इतिहास तो यही है!
अहिंसा, जो सत्य की एकमात्र अभिव्यक्ति है उसे समझने के लिए
ऐसे इतिहास को लांघना होगा
आम आदमी के प्रतिदिन के सामान्य व्यवहार में, आचरण में,
पशुता का क्रमिक त्याग ही है
वास्तविक इतिहास की कहानी है ...
और आत्मबल का विकास, सच्चा इतिहास है.
बाकायदा इसका लेखा-जोखा
हमें नहीं मिलता
लेकिन जैसा की हम जानते हैं
आदमी
अपने आदिकाल में नरभक्षी था.
बाद में शिकार से, अन्य पशुओं के मांस से
अपना पेट भरने लगा, लेकिन भला कबतक अपना जीवन इस भाग-दौड़ में बिताता? सो खेती-बाडी शुरू कर दी उसने घर बसाया परिवार बसे समाज बना – सच्चा इतिहास तो यही है!
यह
वह इतिहास है जिसने हमें अपने पशुबल से मुक्ति
दिलाने की दशा में राह बताई और आत्म-बल के मार्ग पर उन्मुख किया
इंसानियत का सारा इतिहास आज भी इसी दिशा में गतिमान है अपवादों की बात नाकाबिले ध्यान है.
इंसानियत का सारा इतिहास आज भी इसी दिशा में गतिमान है अपवादों की बात नाकाबिले ध्यान है.
(4)
मनुष्य
और मशीन (१)
यह
आदमी भी क्या अजीब शै है! कभी अपने को एक मात्र
हंसने वाला प्राणी बताकर, तो कभी इतिहास जीवी कहकर
स्वयं अपनी ही हंसी उडाता है. और तो और वह इस बात पर भी बड़ा अभिमान करता है कि वही तो है सारे चराचर में जो यंत्रों और मशीनों का आविष्कार करता है और उनका इस्तेमाल करता है
हंसने वाला प्राणी बताकर, तो कभी इतिहास जीवी कहकर
स्वयं अपनी ही हंसी उडाता है. और तो और वह इस बात पर भी बड़ा अभिमान करता है कि वही तो है सारे चराचर में जो यंत्रों और मशीनों का आविष्कार करता है और उनका इस्तेमाल करता है
भूल
जाता है कि वह स्वयं ही एक यंत्र है ऐसा- जीवित और चेतन जिसे
स्वयं ईश्वर ने बनाया है जिसके समक्ष मनुष्य निर्मित मशीनें
कहीं ठहर नहीं सकतीं श्रेष्ठतर वो कभी हो नहीं सकतीं !
यंत्र हैं तो ज़ाहिर है, उनका उपयोग भी होगा और दुरुपयोग भी लेकिन यदि अनियंत्रित दुरुपयोग उनका
कहीं ठहर नहीं सकतीं श्रेष्ठतर वो कभी हो नहीं सकतीं !
यंत्र हैं तो ज़ाहिर है, उनका उपयोग भी होगा और दुरुपयोग भी लेकिन यदि अनियंत्रित दुरुपयोग उनका
मनुष्य की पूरी सभ्यता को ही निगल जाय और आदमी की गरिमा और गैरत को गटक जाए तो ऐसे दुरुपयोग की छूट
भला कैसे दी जाए!
भला कैसे दी जाए!
यंत्रों
के कैसे कैसे तो भयानक आविष्कार हुए हैं कि आज यदि युद्ध लड़ा जाए तो प्राचीन भारत के महायुद्ध में जो अंत हुआ था वैसा ही इस बार भी तय है अस्त्रों की सहायता से सारी की सारी मानव जाति क्रूरता की भागीदार और पात्र बनेगी बरबाद हो जाएगी | हारने वाला तो मिट ही जाएगा
जो पक्ष जीतेगा उसकी हालत भी वही होगी जो पांडवों की हुई थी !
जो पक्ष जीतेगा उसकी हालत भी वही होगी जो पांडवों की हुई थी !
मशीनें
सी मशीनें है! बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के कैसे कैसे तो यंत्र और कितने ही कल-कारखाने बने हैं बस बटन दबाने भर की देर है
कि वे तैयार चीजें उगलने लगते हैं फिर कैसे और कहाँ खपाया जाए उन्हें
बनाने वाले दूर दूर तक बाज़ार तलाशते हैं. बाज़ार की इसी तलाश में कितने ही छोटे छोटे देश पराधीन हो गए और संपन्न देशों ने अपने मशीन-महात्म से साम्राज्य कायम कर लिए |
कि वे तैयार चीजें उगलने लगते हैं फिर कैसे और कहाँ खपाया जाए उन्हें
बनाने वाले दूर दूर तक बाज़ार तलाशते हैं. बाज़ार की इसी तलाश में कितने ही छोटे छोटे देश पराधीन हो गए और संपन्न देशों ने अपने मशीन-महात्म से साम्राज्य कायम कर लिए |
(5)
मनुष्य
और मशीन (२)
इंग्लेंड
में औद्योगिक क्रान्ति मशीनों की ही देन थी. इसी ने भारत को दासता की बेड़ियाँ पहनाईं.
और पहले से ही एक आलसी देश को नींद की गोलियां खिलाईं
और पहले से ही एक आलसी देश को नींद की गोलियां खिलाईं
ऐसे
कल-कारखाने जो दुर्बलों को दबाने
और लूटने के साधन हैं जो काम करने वालों का हाथ काटते हैं और उन्हें अपना गुलाम बना लेते हैं बहिष्कार उनका एक मात्र रास्ता है बचाव का.
और लूटने के साधन हैं जो काम करने वालों का हाथ काटते हैं और उन्हें अपना गुलाम बना लेते हैं बहिष्कार उनका एक मात्र रास्ता है बचाव का.
हथियार
– जो शोषण करने का सामर्थ्य प्रदान करें मनुष्य को उसकी गरिमा से वंचित करें सुरक्षा के नाम पर जो
मानव जाति को युद्ध की आग में झोंक दें पारस्परिक सहयोग की बजाय स्पर्धा और ईर्ष्या में जो इंसानियत को डाल दे परहेज़ करना उससे ज़रूरी है ज़रुरत भी है हमारी.
पर छोटे छोटे यंत्र और मशीनें
पर छोटे छोटे यंत्र और मशीनें
बिना अकर्मण्य बनाए आदमी को
जो सहूलियतें देती हैं
और गरिमा की रक्षा करती हैं उसकी बेशक वरेण्य हैं.
जो सहूलियतें देती हैं
और गरिमा की रक्षा करती हैं उसकी बेशक वरेण्य हैं.
चरखा
भी तो एक
छोटा सा यंत्र ही है लेकिन वह किसी को लूटता नहीं लूट से बचाने की कोशिश करता है हर इंसान को अपनी क्षमता और
शरीर श्रम द्वारा
जीने का अधिकार देता है
तन ढंकने के लिये कपड़ा और रोज़ की रोटी उपलब्ध कराता है.
जीने का अधिकार देता है
तन ढंकने के लिये कपड़ा और रोज़ की रोटी उपलब्ध कराता है.
अधिकतर
मशीनों के साथ यह सच नहीं है वे तो मानव समाज को स्पर्धा, ईर्ष्या और अधिकाधिक लालच के द्वार ही दिखाती हैं
प्रेम और करुणा से प्रेरित आचरण का कोई पाठ नहीं पढ़ातीं. **
प्रेम और करुणा से प्रेरित आचरण का कोई पाठ नहीं पढ़ातीं. **
(६)
मनुष्य और मशीन (३)
मनुष्य और मशीन (३)
कुछ
यंत्र बेशक ऐसे भी हैं पृष्ठभूमि में जिनके भावना
है प्रेम और करुणा की 'सिंगर' सिलाई मशीन को ही ले लें ---
पता
है आपको कितना विचलित हो जाता था बेचारा
सिंगर नाम का आदमी माँ जिसकी रात भर सिलाई कर दो जून की रोटी के लिए अपनी आँखें फोड़ती थी | करुणा से भर सिंगर सोचता कोई तो उपाय कर सकूँ कि सिलाई जैसा काम माँ के लिए सहज हो सके
सिंगर नाम का आदमी माँ जिसकी रात भर सिलाई कर दो जून की रोटी के लिए अपनी आँखें फोड़ती थी | करुणा से भर सिंगर सोचता कोई तो उपाय कर सकूँ कि सिलाई जैसा काम माँ के लिए सहज हो सके
माँ
के लिए इसी प्रेम ने सुझाई
उसे एक तरकीब और
बन गयी सिलाई
सरल करने की एक मशीन मशीन, जो दुनिया की सभी माताओं के लिए एक वरदान साबित हुई !
तो
मशीन जिसके निर्माण में प्रेम और
करुणा हो जो मनुष्य को मनुष्यता की राह दिखाए आदमी भला उसे क्यों न अपनाए ! ज़रूरत बस इतनी सी है आदमी -
मशीन और मशीन में तमीज़ कर पाए . ***
मशीन और मशीन में तमीज़ कर पाए . ***
(7)
अनेकता
में एकता
रूढ़ियाँ और परम्पराएं
जलवायु और परिस्थितियाँ सभी तो सब के लिए अलग अलग होती हैं मत-मतान्तर भी एक से नहीं होते दुनिया में कभी एक ही सम्प्रदाय का राज नहीं हुआ और ऐसा भला कौन चाहेगा कि मृत्यु के स्तर पर आकर हम सब एक हो जाएं !
रूढ़ियाँ और परम्पराएं
जलवायु और परिस्थितियाँ सभी तो सब के लिए अलग अलग होती हैं मत-मतान्तर भी एक से नहीं होते दुनिया में कभी एक ही सम्प्रदाय का राज नहीं हुआ और ऐसा भला कौन चाहेगा कि मृत्यु के स्तर पर आकर हम सब एक हो जाएं !
सभी
को साथ साथ रहना है जीना और यहीं मरना है समझदारी फिर इसी में है एक दूसरे को हम बर्दाश्त करें कमियों को देखने की बजाय विभिन्न मतों और धर्मों की खूबियों को आत्मसात करें.
बेशक,
नैतिक साहस और सद्भाव सहिष्णुता और संयम की ज़रुरत है और
सब धर्मों के मूल में समान रूप से यह पाई जाती है धर्मों के बीच सब धर्मों के बीच
स्थल संपर्क के बहुतेरे हैं,
तुच्छ और छोटी बातों में ही – तेरे और मेरे हैं!
स्थल संपर्क के बहुतेरे हैं,
तुच्छ और छोटी बातों में ही – तेरे और मेरे हैं!
झटक
दें हम ऐसी बातों को परास्त कर दें दुश्मनी घातों को!
धर्मानुसार, निस्संदेह हिन्दू या मुसलमान हैं हम पर ज़रूरत है आज वक्त की सद्भाव बरतें और बने रहें सहिष्णु हम सभी धर्मों का धर्म तो आखिर एक ही है – आत्मा | आत्मा जो ढंकी है सोने के आवरण से हम क्यों भ्रमित हों इस खोल से? क्यों न मर्म को समझें धर्मों में निहित और व्याप्त ‘धर्म’
को जानें.
सभी
धर्म सत्योन्मुख हैं कमियाँ और दोष भी उनमें कुछ हैं अत: सर्व धर्म समानत्व की भावना हो सभी से
रिश्ता हमारा सगा हो मन में समभाव और उदारता हो.
सहिष्णुता न तो बर्दाश्त
है
न ही कोई रियायत
वह तो समभाव है, भाईचारा है
समान रूप से सभी का सम्मान है.
दूसरों का मान और अपना अभिमान है. ***
न ही कोई रियायत
वह तो समभाव है, भाईचारा है
समान रूप से सभी का सम्मान है.
दूसरों का मान और अपना अभिमान है. ***
(8)
अखबार
का कर्तव्य
धंधे
के रूप में
यदि कोई अखबार निकालता है
तो निकाले
पर समाचार पत्र तो लोक सेवा को ही समर्पित होते हैं लेकिन इसमें बहुत से खतरे हैं.
यदि कोई अखबार निकालता है
तो निकाले
पर समाचार पत्र तो लोक सेवा को ही समर्पित होते हैं लेकिन इसमें बहुत से खतरे हैं.
ज़रूरी
है एक सम्पादक को निडर होना और हर हाल में अपनी बात पर डटे रहना
यों
तो सम्पादक बाध्य नहीं है वह अन्याय के खिलाफ या शासन के विरुद्ध अथवा पाखण्ड के प्रतिकार के लिए अपने पत्र में कोई लेख प्रकाशित
करे
या सम्पादकीय लिखे लेकिन जानबूझ कर वह ऐसा करता है
तो दायित्व है उसका कि ज़िम्मेदारी भी इसकी वह स्वीकार करे
कठिन से कठिन दंड का भागीदार ही उसे क्यों न होना पड़े
या सम्पादकीय लिखे लेकिन जानबूझ कर वह ऐसा करता है
तो दायित्व है उसका कि ज़िम्मेदारी भी इसकी वह स्वीकार करे
कठिन से कठिन दंड का भागीदार ही उसे क्यों न होना पड़े
क्षमा
माँगने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. अखबार बंद करने की नौबत आजाए या
मौत का डर ही क्यों न हो डिगना
नहीं चाहिए
हंस कर स्वीकार करना चाहिए
हंस कर स्वीकार करना चाहिए
कितने
ही समान सोच के लोग खड़े हो जाएंगे उसके साथ विरोध
का दायरा बढेगा आग्रह उसका रंग लाएगा सत्य ही जीतेगा ***
(9)
आर्थिक
समानता
समानता
की बात तो बहुत दूर की है
सच तो यह है आज की व्यवस्था में अमीर और गरीब के बीच की खाई घटी नहीं, बढ़ती ही चली गई है
सच तो यह है आज की व्यवस्था में अमीर और गरीब के बीच की खाई घटी नहीं, बढ़ती ही चली गई है
दरिद्र
और उसकी गरीबी से द्रवित होकर अक्सर दान दिया करते हैं लोग. इस प्रकार अपना “धर्म”
निभाते हैं और दोहरा सुख बटोर ले जाते हैं
धन भी कमाते हैं धर्म-कर्म का सुख भी बटोर ले जाते हैं.
धन भी कमाते हैं धर्म-कर्म का सुख भी बटोर ले जाते हैं.
पर
दाता का हाथ तो हमेशा ऊपर रहता है सो
दान में भी ऊंच-नीच
का फर्क तो बना ही रहता है. भूल
जाता है धनवान कि कमाई में उसकी मज़दूरों के शरीर-श्रम का पसीना है कमाए धन पर उसका एकाधिकार नहीं है. समाज का भी योगदान है. मानने को इसे वह तैयार नहीं होता
संपत्ति
के तथाकथित मालिक अपनी
मानसिकता बदलें तो स्थिति में सुधार आए अपरिग्रह और शरीर श्रम की महता समझें अपने अहंकार को थोड़ा कम करें हाथी-दांत की मीनार से थोड़ा नीचे उतरें तो बात बनें ज़रूरी है कि संपत्ति को अपनी वे अपनी न समझें अपने
को उसका बस, ट्रस्टी भर समझें. ***
(10)
ट्रस्टीशिप
ट्रस्टीशिप
आर्थिक
समानता लाने के लिए छोटे-बड़े सबकी गरिमा बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि संपत्ति जिसे हम अपनी समझते है, अपनी न समझें स्वयं को सिर्फ उसका ट्रस्टी समझें समझें क्या, वस्तुत: होते ही हैं हम केवल उसके न्यासी भर !
ज़रा
सोचें संपत्ति जो तथाकथित रूप से आपने कमाई है क्या सचमुच आपकी ही कमाई है ? आप
अपने निजी संसाधनों
और वैयक्तिक प्रतिभा के बल पर ही तो उत्पादन नहीं कर पाते न. इसके लिए श्रम और पूंजी
की भी तो ज़रुरत पड़ती ही है. तभी तो
मिलजुलकर हो पाता है उत्पादन !
और वैयक्तिक प्रतिभा के बल पर ही तो उत्पादन नहीं कर पाते न. इसके लिए श्रम और पूंजी
की भी तो ज़रुरत पड़ती ही है. तभी तो
मिलजुलकर हो पाता है उत्पादन !
वह
पूंजी हो या श्रम सभी कुछ हमें समाज से प्राप्त होता
है. शेयरों और बैंक-ऋण इत्यादि से जुटाई जाती है पूंजी श्रमिकों का लगता है श्रम तब
कहीं बन पाता है उत्पादन का क्रम ऐसे में कमाया गया लाभ सिर्फ
एक व्यक्ति या घराने का भला
कैसे मान लिया जाय ! और उसके ही ऐशोआराम में उसे खर्च क्यों किया जाए ?
यह
कैसी विडम्बना है कि पैसे वाला व्यक्ति इस छोटी सी बात को समझ ही नहीं पाता
या शायद समझना ही नहीं चाहता वह तो ठीक इसके विपरीत सोचता है श्रमिक को हिकारत की नज़र से देखता है! परिग्रह में लिप्त वह सिर्फ अपना स्वार्थ ही देख पाता है. गैरज़रूरी विलासता की अपनी हवस में धन और पैसे का दुरुपयोग करता है.
या शायद समझना ही नहीं चाहता वह तो ठीक इसके विपरीत सोचता है श्रमिक को हिकारत की नज़र से देखता है! परिग्रह में लिप्त वह सिर्फ अपना स्वार्थ ही देख पाता है. गैरज़रूरी विलासता की अपनी हवस में धन और पैसे का दुरुपयोग करता है.
बदलने
के लिए यह मनोवृत्ति ज़रूरी है कि समाज आग्रह करे
धनिकों से कि वे सत्य
के सन्देश को अनदेखा न करें अपने परिग्रह और अहंकार पर लगाम लगाएं मन में अपने श्रमिकों और दरिद्रों के प्रति करुणा
जगाएं अपनी वाजिब ज़रूरतें बेशक पूरी करें
लेकिन समाज को भी अभाव-ग्रस्त न होने दें. उसे उसका उचित अंशाधिकार सहर्ष प्रदान करें.
लेकिन समाज को भी अभाव-ग्रस्त न होने दें. उसे उसका उचित अंशाधिकार सहर्ष प्रदान करें.
यह
बात दान-दक्षिणा की नहीं है
समाज ने जो योगदान दिया है धनार्जन में वह धन समाज की थाती है और उसी के लाभार्थ धन के विनियोग की अपेक्षा धनवान से की गयी है ह्रदय परिवर्तन के लिए दबाव तो बनाना होगा ज़रूरत पड़े तो सत्याग्रह के साथ साथ कानून भी बनाना होगा अतिरिक्त संपत्ति को अंतत: समाज के हित में, लोककल्याण में लगाना होगा . ***
समाज ने जो योगदान दिया है धनार्जन में वह धन समाज की थाती है और उसी के लाभार्थ धन के विनियोग की अपेक्षा धनवान से की गयी है ह्रदय परिवर्तन के लिए दबाव तो बनाना होगा ज़रूरत पड़े तो सत्याग्रह के साथ साथ कानून भी बनाना होगा अतिरिक्त संपत्ति को अंतत: समाज के हित में, लोककल्याण में लगाना होगा . ***
(11)
ईश्वर
क्या
और कैसे बताएं ईश्वर के बारे में ?
विष्णु
सहस्रनाम में
यूं तो हज़ार नाम गिनाए गए हैं किन्तु ईश्वर की नामावली यहीं समाप्त नहीं हो जाती सच तो यह है कि इस चराचर जगत में जितने भी प्राणी हैं
ईश्वर के उतने ही नाम हैं.
फिर भी नामावली अधूरी ही रह जाती है.
यूं तो हज़ार नाम गिनाए गए हैं किन्तु ईश्वर की नामावली यहीं समाप्त नहीं हो जाती सच तो यह है कि इस चराचर जगत में जितने भी प्राणी हैं
ईश्वर के उतने ही नाम हैं.
फिर भी नामावली अधूरी ही रह जाती है.
ईश्वर
तो अनाम है नाम
से परे नामातीत है अरूप
है, रूपातीत है वाणी से परे अवाक है, अनिर्वचनीय है
लेकिन
परिभाषित करते हैं ईश्वर को जो इश्क या प्रेम से ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को बहुत
कुछ पहचानते हैं वे
उसके मर्म और अर्थ तक पहुँच पाते हैं.
उसके मर्म और अर्थ तक पहुँच पाते हैं.
पर
इश्क के भी तो कितने ही रूप हैं मजाजी और
हकीकी वासनात्मक और निष्काम प्रेम के किस रूप से परिभाषित करें ? क्यों न
हम देखें ईश्वर को सत्य
के रूप में? द्वंद्व और संशय से परे द्विअर्थी जो कभी नहीं हो सकता
सत्य
तो शाश्वत है, अटल है आग्रह
हमारा सत्य पर होता
सदा ईश्वरोन्मुख है.
ईश्वर को सत्य और सत्य को ईश्वर मानने में ही निहित हमारा सुख है ***
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ईश्वर को सत्य और सत्य को ईश्वर मानने में ही निहित हमारा सुख है ***
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