Saturday, August 5, 2017

गांधी का समाज दर्शन


                          गांधीजी का समाज दर्शन - चार आर्य-सत्य
                                     डा. सुरेन्द्र वर्मा  
    बुद्ध ने अपने व्यावहारिक दर्शन को ‘चार आर्य-सत्य’ के प्रारूप में प्रस्तुत किया था. इस आलेख में इसी प्रारूप का अनुगमन करते हुए गांधी जी के समाज दर्शन को व्यवस्थित किया गया है. हम सभी को विदित है कि बुद्ध ने अपने विचारों की विवेचना १, दु:ख ; २, दु:ख समुदय ; ३, दु;ख निरोध तथा ४, दु:ख निरोध मार्ग शीर्षकों के अंतर्गत की थी, और इन्हें चार ‘आर्य-सत्य’ कहा था. गांधी जी ने अपने विचारों को कभी भी किसी पद्धति में प्रस्तुत नहीं किया. वह तो वस्तुत: वाद-विरोधी थे. वे कभी नहीं चाहते थे कि उनके विचार “गांधी-वाद” बन जाएं. फिर भी विचारों को किसी एक पद्धति में व्यवस्थित करने से बचा नहीं जा सकता. गांधी जी के विचारों को बुद्ध की ‘चार आर्य सत्य’ की पद्धति में व्यवस्थित करने का विशेष कारण भी है.
    गांधी और बुद्ध दोनों ही मूलत: व्यावहारिक प्रतिभा संपन्न विचारक थे. उन्हें अमूर्त चिंतन में कोई दिलचस्पी नहीं थी. बुद्ध का रुझान तो स्पष्ट: तत्वमीमांसा-विरोधी ही था. उन्होंने जगत, आत्मा, मृत्योपरांत जीवन आदि, समस्याओं पर कभी अपना कोई मत अभिव्यक्त नहीं किया. उनके अनुसार इन सारे प्रश्नों से कोई लाभ होने वाला नहीं है. वे ‘धम्म’ से सम्बंधित नहीं हैं. बुद्ध का दृष्टिकोण नितांत व्यावहारिक था. और इस दृष्टि से वे सारी बातें जो दु;ख और उसके निराकरण के लिए कुछ भी नहीं बतातीं, बेकार की बातें हैं. बेशक,  ईश्वर, सत्य जैसी तत्वमीमान्सात्मक धारणाओं से सम्बंधित गांधी जी की अपनी मान्यताएं थीं और वह जब भी आवश्यकता होती थी इन दार्शनिक समस्याओं पर अपने दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करते थे. लेकिन बहुत कुछ बुद्ध की ही तरह इन समस्याओं को लेकर कभी न ख़त्म होनेवाले विवाद में नहीं पड़ते थे. उनकी दृष्टि साफ़ तौर पर मानवीय और व्यावहारिक थी. वह सिद्धांतों और विचारधाराओं को उनके व्यावहारिक परिणामों से आंकते थे. उनके लिए कोई भी कारगर सिद्धांत महज़ बौद्धिक और अकादमिक विचारधारा से कहीं अधिक मूल्यवान है. और इसके बावजूद गांधी जी को हम एक अर्थक्रियावादी (अमेरिकन शब्दावली में, “प्रेग्मैटिक”) दार्शनिक नहीं मान सकते. इसका कारण है. गांधी जी, और न ही बुद्ध, सत्य को उसकी  उप-  योगिता से परिभाषित नहीं करते और न हीं वे किसी व्यावहारिक अनुभव के आधार पर सत्य को प्रतिफलित करते हैं.
     इसके अतिरिक्त, पूर्णत: व्यावहारिक होने के नाते बुद्ध और गांधी दोनों ही ‘प्रोटेस्टेंट’ हैं; गलत बात का विरोध करने से न हिचकने वाले विचारक हैं. बुद्ध ने हिन्दू पुरोहितवाद और धर्म में व्याप्त वाह्य आडम्बरों का खुलकर विरोध किया था तथा जातिवाद, मूक पशुओं के बलिदान की पृथा, और अस्पृश्यता के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद की थी. गांधी जी भी कोई कम प्रोटेस्टेंट नहीं थे. उन्होंने सभी प्रकार के अन्याय का विरोध किया और उसे समाप्त करने की लिए शान्त-पूर्ण प्रतिरोध के लिए अन्याय सहने वालों को आमंत्रित किया. गांधी जी        सामान्य अर्थ में शांतिवादी नहीं थे और न ही उनकी अहिंसा कायरतापूर्ण समर्पण है. दुष्टता, क्रूरता, और अन्यायपूर्ण ज़बरदस्ती से भी अधिक निर्विरोध समर्पण को वह हिंसक मानते थे. अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध पाप नहीं है. प्रतिरोध केवल अहिंसात्मक रूप से करना ही उचित है. क्योंक हिंसा की प्रतिक्रिया और अधिक हिंसा में ही होती है और यह चक्र कभी न समाप्त होने वाला है.
           गांधी और बुद्ध के बीच जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है वह उन दोनों का अपनी अपनी ज़िंदगी में ताउम्र दुःख से जूझना और उसके निराकरण के लिए उपाय ढूँढ़ना है. व्यावहारिक और विरोधी प्रवृत्ति तो हमें हर महत्वपूर्ण सुधारक और शिक्षक में मिल ही जाएगी लेकिन बुद्ध और गांधी को मूलत: जो बात एक ही प्रकार का शिक्षक बनाती है वह उन दोनों की दु;ख के प्रति अविराम चिंता ही है. बुद्ध का पहला आर्य सत्य दुःख की पहचान करना ही है. वार्धक्य, रोग, शारीरिक क्षीणता और मरण – ये सभी दुःख हैं. कष्ट, क्लेश, तकलीफ, हम कुछ भी क्यों न कहें अर्थ दुःख से ही है. बुद्ध मनुष्य के इस दुःख को जीवन के सर्वाधिक बडे सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं. दुःख के बारे में इतनी जागरूकता हमें बुद्ध के अलावा शायद ही और किसी विचारक में मिलती हो; बुद्ध के बाद बस गांधी ही एक मात्र ऐसे चिन्तक हैं जो बुद्ध की भाँति ही सारी उम्र दुःख के प्रति चिंतित रहे. मनुष्य का दु;ख दुनिया का सर्वोच्च सच है – यह मूल भवात्मक अनुभव था जिसने गांधी के सोच को पूरी तरह जकड लिया. प्राणियों के दु;ख को हम अनदेखा नहीं कर सकते. यह एक गंभीर वास्तविकता है. लेकिन वह दु;ख जिसे गांधी ने रेखांकित किया वह किसी एक प्राणी का वैयक्तिक दु;ख न होकर सामाजिक दु;ख है जो अन्याय के कारण जन्म लेता है. अन्याय ही वह वास्तविक समस्या है जो गांधी को परेशान करती है. और इसके समाधान को प्राप्त करने के लिए गांधी अपना सारा जीवन लगा देते हैं.
     इस प्रकार हम देखते हैं कि बुद्ध और महात्मा दोनों के ही अनुभव में संसार की सबसे बड़ी समस्या दु;ख ही है. किन्तु गांधी का बल अन्याय रूपी दु;ख पर है जिसे हम सामाजिक दु;ख कह सकते हैं. गांधी के सामाजिक दर्शन को चार आर्य सत्य की बौद्ध प्रणाली के अनुरूप व्यवस्थित करने का ओचित्य भी इसीलिए है. दोनों का ही अभीष्ट दु;ख का निवारण है. गांधी के समाज दर्शन को यदि बौद्ध प्रारूप में व्यवस्थित किया जाए तो उनके चार आर्य सत्य कुछ इस प्रकार होंगे. १, समाज में अन्याय व्याप्त है.(अन्याय) २, अन्याय का कोई न कोई कारण है.(अन्याय समुदय) ३, अन्याय को समाप्त किया जा सकता है (अन्याय निरोध) तथा ४, अन्याय-निरोध मार्ग.
     गांधी का सम्पूर्ण समाज-दर्शन अन्याय की समस्या के सन्दर्भ में ही ठीक-ठीक समझा जा सकता है. दु;ख वैयक्तिक हो सकता है. वृद्धावस्था और शारीरिक रोग व्यक्तिगत पीडाएं हैं. किन्तु अन्याय के सम्बन्ध में विचार करते समय हम उसके सामाजिक सन्दर्भ को देखने के लिए बाध्य हैं. एक ऐसी सामाजिक परिस्थिति जिसमें एक अत्याचार करने वाला और दूसरा सहने वाला होता है, यह हर अन्याय की मान्यता है. जिस सीमा तक अन्याय सामाजिक दु;ख है, गांधी का दर्शन बुद्ध के चिंतन की ही आगे की कड़ी है. बुद्ध का ध्यान जबकि व्यक्ति पर केन्द्रित था जो रोग, वृद्धावस्था और मृत्यु का भागीदार है, गांधी-दर्शन आवश्यक रूप से सामाजिक शोषण से जुड़ा हुआ है जिसे व्यक्तियों का कोई न कोई समूह भोगता है. किन्तु व्यक्ति और समूह के बीच विभाजन-रेखा खींचना असंभव है. नीतिशास्त्र और समाज-दर्शन एक दूसरे से इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि निश्चित रूप से  कह सकना कि, यहाँ व्यक्ति-नीतिशास्त्र समाप्त होता है और अब समाज-दर्शन आरम्भ होता है, बहुत कठिन है. बौद्ध और गांधी-दर्शन में भी इस प्रकार की निरंतरता है. दोनों ही चिन्तक एक-सूत्रता दर्शाते हैं और वह विभाजन-रेखा जो एक-दूसरे को अलग करती है, सदैव अविहित है. आखिर दोनों के ही चिंतन को उकेरने वाला तत्व तो दु;ख ही है! पर जहां बुद्ध व्यक्तिगत दु;ख पर बल देते हैं, गांधी दर्शन में दु;ख का प्रत्यय सामाजिक अन्याय के सभी पहलुओं को रेखांकित करता है..वह चाहे राजनैतिक दासता हो या आर्थिक शोषण, रंग-भेद हो अथवा अस्पृश्यता, जातीय वैमनस्य हो अथवा धार्मिक रूढ़िवादिता.
   समाज में अन्याय : गांधी को बचपन से ही सामाजिक शोषण और अन्याय का बोध हो गया था और मानवीय दु;ख की कठिन समस्या उनके चिंतन और क्रियाकलाप का आरम्भ से ही एक महत्वपूर्ण प्रेरणात्मक अंग बन चुकी थी. गांधी जी जब मुश्किल से बारह वर्ष के रहे होंगे तभी उनके मन में यह विचार कि अ- स्पृश्यता बिलकुल गलत है और अन्यायपूर्ण है, पूरी तरह घर कर गया था. उनको अपने परिवार के सफाई-कर्मी (मेहतर) को छूने से मना किया गया था. और उन्हें आदेश था कि यदि भूल से भी वह उसका स्पर्श कर बैठते हैं, तो विधिवत स्नान करके अपने शरीर को शुद्ध करें. तेरह वर्ष की आयु में जब उन्होंने शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड जाने का निश्चय किया तो उन्हें उनकी जाति से बहिष्कृत कर दिया गया. दक्षिण अफ्रीका में जहां भारत वंशियों को अर्ध-बर्बर एशियाई और असभ्य समझा जाता था, गांधी को रंग-भेद का सामना करना पडा जिसके कारण उन्होंने अनेकों व्यक्तिगत कठिनाइयां और कष्ट सहे. भारत वापस आने पर उन्होंने आर्थिक शोषण के विरुद्ध सामाजिक परिस्थितियों से संघर्ष किया, साथ ही राजनैतिक दासता का तीव्र अनुभव कर स्वतंत्रता संग्राम छेड़ दिया. भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उनका धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध संघर्ष और जातीय समन्वय और शान्ति की वेदी पर उनका बलिदान सर्व विदित है. गांधी का समस्त जीवन इस प्रकार अत्याचार और अन्याय, अभाव और भय, हत्या और हिंसा के विरुद्ध सक्रिय विरोध का जीवन रहा. उनकी आत्मा जबतक एक भी दु;ख और अन्याय की घटना की असहाय साक्षी रही संतोष प्राप्त न कर सकी. उन्होंने दु;खी मानवता से अपना एकाकार इस प्रकार कर लिया था की वे अन्याय की किसी भी घटना के लिए अपने को दोष-मुक्त न कर पाते थे.
     अन्याय का कारण (अन्याय समुदय): समाज में अन्याय की उपस्थिति ने गांधी को उन परिस्थितियों के कारणों में भीतर तक जाने के लिए बाद्ध्य किया जिनके परिणाम स्वरूप दु;ख और शोषण पनपता है. उन्होंने धीरे-धीरे इस बात का अनुभव किया की अन्याय पूर्ण परिस्थितियों का प्रादुर्भाव भय और हिंसा की भावनाओं द्वारा होता है – भय, अत्याचार सहने वाले के पक्ष में और हिंसा, अत्याचार करने वाले के पक्ष में. भय और हिंसा समस्त अत्याचार और अन्याय का आदि कारण है. वे एक-दूसरे से स्वतन्त्र नहीं हैं, बल्कि एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं. डर वास्तव में हिंसा का ही रूप है. कारण स्पष्ट है. डर की पकड़ में एक भयाक्रांत व्यक्ति किसी भी अपराध अथवा दुराचार में लिप्त हो सकता है. वह किसी भी सीमा तक गिर सकता है. और कितना ही अन्याय सहन कर सकता है. हिंसा तो फिर भी भय की तुलना में सकारात्मक है. भय तो पूर्णत: नकारात्मक होता है. मनुष्य जो मनुष्य से डरता है, गांधी का कथन है, मनुष्य के पद से गिर जाता है. `
    अन्याय का निरोध  : अन्याय, भय और हिन्सा अनिवार्यत: परस्पर सम्बंधित हैं. एक को दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता. गांधी के मन में अन्याय का यह गति-विज्ञान बिलकुल स्पष्ट है. फिर भी वह हतोत्साहित नहीं होते. उनका यह पूर्ण विशास है कि अत्याचार पर विजय पाई जा सकती है. गलत को सही किया जा सकता है, अन्याय का निरोध किया जा सकता है. यह एक विचित्र विरोधाभास है कि जीवन भर अस्तित्व के अन्धकारमय पक्ष से जूझने के बावजूद भी गांधी ने जीवन के प्रति कभी भी अभद्र और नकारात्मक दृष्टिकोण नहीं अपनाया. उन्होंने नैतिक आस्थाओं को नीत्शे और अन्य समकालीन अस्तित्ववादियों की तरह कभी झूठी मान्यताएं नहीं समझा. इसके विपरीत, उन्होंने सदैव एक आशाजनक और उज्जवल दृष्टिकोण बनाए रखा. नितांत अन्धकार और दु;ख के काल में भी उन्होंने शिष्ट विनोद को सुरक्षित रखा. गांधी के इस पक्ष को व्याख्यायित करना तनिक कठिन है क्योंकि प्राय: देखा गया है की जब मनुष्य एक अन्याय पूर्ण परिस्थिति का सामना करता है तो वह या तो पूर्णत: पराजित अनुभव करने लगता है अथवा निराशा के समुद्र में डूब जाता है. कभी कभी वह एक स्वनिर्मित अयथार्थ में पलायन भी कर जाता है और एक सतही आशावादिता बनाए रखता है. गांधी ने इसमें से कोई विकल्प नहीं अपनाया. यह उल्लेखनीय है कि गांधी ने यद्यपि कभी निराशाजनक दृष्टि स्वीकार नहीं की किन्तु वह दु:खी मानवता की पीड़ा से अपना पूर्ण एकाकार किए रहे. उन्होंने एक आशावान और उज्जवल दृष्टि अपनाई, और यह कोई उथली या पलायनवादी दृष्टि नहीं थी. वास्तव में उनकी प्रसन्नचित्तता के रहस्य को हम उनके सत्य की अंततोगत्वा विजय में विशवास के द्वारा ठीक ठीक समझ सकते हैं.
     गांधी की संयमित आशावादिता उनके तत्व दर्शन संबंधी विश्वासों से घनिष्ट रूप से सम्बंधित है. गांधी ने परम सत्ता को सत्य के रूप में स्वीकार किया है और सत्य कभी परास्त नहीं हो सकता. उसकी अस्वीकृत असंभव है. यह सत्य के स्वभाव में ही है कि वह अपने को दृढ़तापूर्वक स्थापित करे. सत्य ‘सत’ अथवा ‘अस्तित्व’ है. और असत्य केवल दिखावटी अस्तित्व है. वास्तव में उसका अस्तित्व है ही नहीं. असत्य सत्य पर हावी होने का कितना ही प्रयत्न क्यों न करे ‘अस्तित्व’ अस्तित्व ही रहेगा. वह कभी अनास्तित्व हो ही नहीं सकता. अंत में सत्य की ही विजय होगी.
     किन्तु प्रश्न यह है कि तत्वदर्शन संबंधी यह सत्य हमारे व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार क्रियान्वित हो सकता है? गांधी के अनुसार यह प्रतिदिन के हमारे जीवन में अहिंसा के रूप में काम करता है. गांधी इतिहास की प्रक्रिया को अहिंसा की दिशा में एक अथक प्रयास मानते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो गांधी का विश्वास है कि समस्त मानवता अब तक लुप्त हो गई होती. उस इतिहास का जो केवल युद्ध और हिंसा भय और शंका घृणा और ईर्ष्या का उल्लेख करता है कोई महत्त्व नहीं है. ऐतिहासिक प्रक्रिया के पीछे वस्तुत: जो प्रेम और अहिंसा का सिद्धांत काम करता है वह घटनाओं के इतिहासज्ञ की दृष्टि में नहीं आ पाता. सत्य इतिहास का अतिक्रमण कर जाता है. पर अंतत: सत्य को प्रकट होना ही है. गांधी का यही विशवास उन्हें आशावादी दृष्टि अपनाने के लिए बाध्य करता ही. गांधी को पूर्ण आस्था है कि अंतत: अन्याय की समाप्ति होगी.    
     अन्याय निरोध मार्ग :  अन्याय की समाप्ति तो अवश्यम्भावी है. परन्तु मनुष्य अनंत काल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता. न्याय की प्रक्रिया को तीव्रतर करना होगा और यह भी स्पष्ट है कि न्याय को हम भय और हिंसा से प्राप्त नहीं कर सकते क्योंकि वे तो अन्याय के ही रूप हैं –और उसके कारण भी हैं. हिंसा से और अधिक हिंसा उत्पन्न होती है, उससे और भी अधिक भय उत्पन्न होता है. इस प्रकार अन्यायपूर्ण परिस्थिति और भी सुदृढ़ होती है. हमें क्रिया-प्रतिक्रया की यह श्रृंखला कहीं न कहीं रोकनी ही होगी. पर हिंसा के इस क्रम को किस प्रकार रोका जाए? गांधी के अनुसार इसे रोकने का एक ही मार्ग है और वह है, अहिंसात्मक विरोध.  इसे गांधी ने ‘सत्याग्रह’ कहा है. सत्याग्रह को, जिसकी मान्यता अन्याय के विरुद्ध खुल्लमखुल्ला विरोध है, संघर्ष और युद्ध की एक प्राविधि के रूप में अच्छी तरह समझा जा सकता है.
     गांधी को उस अन्यायपूर्ण परिस्थिति से जिसमें उन्होंने संसार को और स्वयं अपने को जीते हुए पाया, एक तीव्र वितृष्णा हुई. उनकी तह कामना थी कि वह इसमें परिवर्तन ला सकें. फलस्वरूप सत्याग्रह का प्रतिपादन हुआ. सत्याग्रह इस तरह एक क्रियात्मक सिद्धांत है जो स्वभावत: एक सक्रिय प्रवृत्ति की मांग करता है. इसका अर्थ अन्याय के प्रति निष्क्रिय सहनशीलता से नहीं लगाया जाना चाहिए. अहिंसात्मक विरोध अविरोध नहीं है. वह हमें जो भी अशुभ है उसका विरोध करने के लिए आमंत्रित करता है. इसकी दिशा अन्याय को चुपचाप सहन करने की न होकर सकारात्मक है. इसके विपरीत अविरोध एक नकारामक मन:स्थिति है. जबकि     अहिंसात्मक विरोध एक वीरोचित संघर्ष है. इसका अर्थ अत्याचारी की इच्छानुसार दुर्बल होकर झुक जाना नहीं है बल्कि उसके अत्याचार के विरुद्ध अपने समस्त आत्मबल को संघर्ष के लिए तैयार करना है.
    सत्याग्रह बहुत कुछ सैनिक संग्राम से मिलता-जुलता है. एक तो दोनों में समानता इस अर्थ में है कि दोनों ही दुर्बलतापूर्ण आत्मसमर्पण में विश्वास नही करते. दूसरे, दोनों ही संघर्ष को मानकर चलते हैं. लेकिन इनकी तुलना बस यहीं तक है. इससे आगे दोनों की दिशाएं भिन्न हो जाती हैं. अविरोध में भय निहित है और सैनिक संग्राम में हिंसा. सतही तौर पर दोनों एक-दूसरे के विपरीत दिखाई देते हैं किंतु मूलत: वे एक ही हैं. भय वस्तुत: अव्यक्त हिंसा है और हिंसा सक्रिय भय है. भय और हिंसा इस प्रकार एक ही तत्व के दो पक्ष हैं, एक नकारात्मक और दूसरा सकारात्मक. नकारात्मक होने के नाते भय बेशक हिंसा से भी अधिक गिरा हुआ है. गांधी इसीलिए कभी कभी दुर्बलतापूर्ण आत्मसमर्पण से सैनिक संग्राम को अधिक पसंद करते हैं, यदि हमें इन्हीं दो में से किसी एक का चुनाव करना हो. पर सैनिक संग्राम संघर्ष करने का कोई स्तुत्य मार्ग नहीं है. हमारा चुनाव इन दोनों के बीच नहीं होना चाहिए. किसी समस्या का हल हिंसा या/और भय नहीं हो सकता.
     हिंसा किसी भी समस्या का हल एक तो इसलिए नहीं है कि वह अन्यायपूर्ण अवस्था और उन लोगों में जो उसे आरोपित करते हैं तमीज़ नहीं कर पाती. वह अत्याचार और अत्याचारी में भेद नहीं करती. यह अत्याचार करने वाले को ही समाप्त कर देना चाहती है क्योंकि वह उसे ही अपना शत्रु मानती है जबकि वास्तविक शत्रु स्वयं अत्याचार है. अत: उद्देश्य अन्याय की समाप्ति होना चाहिए न कि अन्यायी की हिंसा. इसके अतिरिक्त हिंसा समस्या के समाधान के लिए एक प्रतिकूल (अथवा, कम से कम ऐसा जो अनुकूल न हो) वातावरण का निर्माण करती है. लौटकर थप्पड़ मार देना भावात्मक संतुष्टि भले दे किन्तु सामाजिक रूप से एक भयंकर बात है. इससे शत्रुता का वायुमंडल निर्मित होता है तथा शंका और अविश्वास को बल मिलता है. और फिर, हिंसा समस्या का कोई स्थाई हल भी प्दान नहीं करती क्योंकि उसकी प्रतिक्रिया अवश्यंभावी है. घृणा और हिंसा से केवल घृणा और हिंसा ही उत्पन्न हो सकती है और यह क्रम सदैव जारी रहता है. अत्याचारी को दंड देना अथवा नष्ट कर देना हिंसा और अत्याचार के क्रम को नए सिरे से आरम्भ करना है. यह तांडव कभी न समाप्त होने वाला है. अन्याय और अत्याचार की समस्या सुलझाने हेतु हिंसा का उपयोग इस प्रकार अव्या-वहारिक भी है. हिंसा न केवल अविवेकपूर्ण, भयंकर और अव्यावहारिक है, हिंसा असत्य पर भी आधारित है. इसमे हत और हत्यारे जो दोनों मूलत: मानवीय हैं, उनका खंडन है. मनुष्य की पहचान पशु-बल से नहीं होती वरन आत्मबल से की जाती है. यह आत्म बल ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है. आत्मबल ही मनुष्य का सत्य (सत) है. सत्याग्रह का शब्दार्थ सत्य पर आग्रह करना है. हम असत्य को धारण करके सत्य के लिए आग्रह नहीं कर सकते.
     गांधी का साधन की शुद्धता पर बहुत आग्रह था. वह अपनी आदर्श सामाजिक व्यवस्था को बड़ी शिद्दत से वास्तविकता के धरातल पर उतारना चाहते थे. किन्तु इसके लिए उन्होंने साधन के आधारभूत महत्त्व को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया. एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण जो प्रत्येक अत्याचार और अनुचित तत्व से रहित हो, हिंसा और असत्य पर नहीं टिक सकता. ‘अपने साधन की रक्षा करो’ गांधी का आग्रहपूर्ण कथन है, ‘ऐच्छिक साध्य अपने आप ही प्राप्त हो जाएगा.’ साध्य को हम साधन से पृथक नहीं कर सकते क्योंकि वह हमारी उन प्रक्रियाओं की श्रृंखला का जिन्हें हमने साधन रूप में अपनाया है, परिणाम मात्र होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है. अत: एक न्याय पूर्ण और मानवी समाज व्यवस्था स्थापित करने के लिए हमें उचित और सही माध्यम भी अपनाने होंगे. हिंसा पशु-बल है और इसीलिए मानव-सन्दर्भ में अनुचित है. अन्याय के विरोध के लिए कारगर एक मात्र अहिंसक मार्ग ही होता है.
          अहिंसात्मक मार्ग अन्यायपूर्ण व्यवस्था में और उन लोगों में जो उसे आरोपित करते हैं, स्पष्ट अंतर बनाए रखता है. अत: अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुए भी एक सत्याग्रही अत्याचारी मनुष्य के हित का पूरा पूरा ध्यान रखता है, भले ही वह एक विक्षिप्त पशु की तरह ही व्यवहार क्यों न करे. मनुष्य की प्रतिष्ठा और सम्मान में सत्याग्रही की पूर्ण आस्था है. वह शत्रु को भी मानवता से वंचित प्राणी नहीं समझता कि जिसके साथ अमानवीय व्यवहार क्षम्य हो. यह उसे वस्तुत: अपना संभावित मित्र मानता है. क्योंकि मानवता का अंश हम सभी में समानरूप से विद्यमान है. अन्यायी वस्तुत: एक अनुचित व्यवस्था का बंदी हो जाता है जिसे घृणा की बजाए दया की अधिक आवश्यकता है. अत्याचारी की हिंसा को वहन कर सत्याग्रही उसे हिंसा की निरर्थकता का बोध कराने में सहायता करता है. और साथ ही उसके श्रेष्ठतर पक्ष को पुनर्विचार के लिए आमंत्रित करता है. कोई भी मनुष्य पूर्णरूपेण अन्यायी नहीं हो सकता. वह कितनी ही क्षीण क्यों न हो, प्रत्येक मनुष्य में नैतिकता की एक लौ प्रज्ज्वलित रहती है. सत्याग्रह भावात्मक प्रेम के सिद्धान्त पर आधारित है. और मानव सम्मान और जीवन की पवित्रता उसकी पूर्व-मान्यताएं हैं. गांधी को पूर्ण आस्था है कि प्रेम और बलिदान अंतत: सबसे क्रूर अत्याचारी के ह्रदय को भी पिघला सकेगा.
     सत्याग्रह में स्वेच्छा से अपनाए दु;ख को आत्म-पीड़न रति (masochism) नहीं कहा जा सकता. क्योंकि सत्याग्रही ‘शत्रु’ की हिंसा को सहन करने में व्यक्तिगत संतुष्टि की अनुभूति नहीं करता. वह तो दूसरे पक्ष को यह बोध कराने के लिए हिंसा को सहन करता है कि हिंसा असमर्थ है, कि दूसरे की अप्रसन्नता से अपनी  प्रसन्नता खरीदी नहीं जा सकती, कि जिस सीमातक तुम मेरा अहित करते हो, तुम स्वयं अपना ही अहित करते हो. सत्याग्रह में आत्मदंड और उससे आत्मसंतुष्टि की भावनाएं निहित नहीं हैं, बल्कि विरोध, युद्ध और संघर्ष की भावना रेखांकित है. सत्याग्रह, असहयोग द्वारा इन भावनाओं पर बल देता है.
     असहयोग सत्याग्रह का एक अविच्छिन्न अंग है. अत्याचारों के अनुचित संकल्प से सहयोग करने के लिए अस्वीकृति और उसके अनैतिक अधिकार के प्रति अवज्ञा सत्याग्रह को सक्षम और सफल बनाने के लिए अनिवार्य है. केवल बलिदान और दु;ख उठाना ही काफी नहीं है. अनुचित आज्ञाओं का खुलेआम विरोध और उनका व्यक्त रूप से पालन न करना अहिंसात्मक संघर्ष को सार्थक बनाने के लिए अनिवार्य है. प्रेम और अहिंसा पर आधारित स्वेच्छा से दु;ख वहन करना और अन्यायी के अनुचित संकल्प से सहयोग न करना- देर सवेर अत्याचारी को हिंसा का मार्ग छोड़ देने के लिए मजबूर कर देगा. और विवेकपूर्ण बातचीत की राह अपनाने के लिए बाध्य करेगा. लेकिन यह सब कई बातों पर निर्भर करता है. यह इस पर निर्भर करता है कि एक  सत्याग्रही कितने समय तक अन्यायपूर्ण संकल्प से असहयोग कर सकता है. यह इस पर भी निर्भर करता है कि सत्याग्रही अत्याचारी द्वारा लादी गई हिंसा की कितनी पीड़ा को वहन कर पाता है और साथ ही यह इस पर भी निर्भर करता है कि अत्याचारी पाप में किस गहराई तक डूबा हुआ है और सत्य और न्याय की नैसर्गिक क्षमता के लिए कितना ग्रहणशील है.
     गांधी एक आदर्शवादी समाज-चिन्तक हैं किन्तु उनका आदर्शवाद स्वप्निल नहीं है. वह एक अत्यंत कुशल राजनीतिज्ञ रहे हैं जिन्होंने युद्ध का हिंसात्मक तरीका ठीक इसलिए अस्वीकार किया की वह अव्यावहारिक है. उन्होंने राजनीति में सत्याग्रह को प्रवेश देकर एक मानवीय और न्यायपूर्ण व्यवस्था को प्रतिष्ठित करने के लिए मार्ग तैयार किया. अब हम भारतीयों पर यह उत्तरदायित्व है की हम उससे लाभ उठाएं.

१०,एच आई जी                                                     (डा. सुरेन्द्र वर्मा)                    १, सर्कुलर रोड                                                      मो, ०९६२१२२२७७८        इलाहाबाद (उ.प्र.) -२११००१
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